जामगा रेलवे स्टेशन पर ग्रामीणों ने DRM की गाड़ी रोककर बताई परेशानी

DRM ने ग्रामीणों की विवस्ता को किया नजर अंदाज ग्रामीणों को ही सुनाई खरी खोटी

रायगढ़। रायगढ़ ब्लॉक के ग्राम पंचायत कोलाईबाहल स्थित जामगा रेलवे स्टेशन पर अधूरे पड़े फुटओवर ब्रिज को लेकर ग्रामीणों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। लंबे समय से अधूरे फुटओवर ब्रिज के कारण स्कूली बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और आम यात्रियों को रेलवे ट्रैक पार करने जैसी जोखिम भरी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

बताया जा रहा है कि इसी समस्या को लेकर ग्रामीणों ने रेलवे के DRM की गाड़ी रोककर अपनी परेशानी और अधूरे फुटओवर ब्रिज की समस्या उनके सामने रखी। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि DRM उनकी समस्या को गंभीरता से सुनेंगे और जल्द समाधान का आश्वासन देंगे, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार उन्हें समझाने के बजाय फटकार का सामना करना पड़ा।

ग्रामीणों का कहना है कि जब उन्होंने फुटओवर ब्रिज को जल्द पूरा कराने की मांग रखी तो DRM की ओर से इसे पूरा होने में करीब दो वर्ष का समय लगने की बात कही गई। और ग्रामीणों की विवस्ता को समझने के बदले मे ग्रामीणों को ही गाड़ी के निचे से क्यूँ आना जाना करते तुम अपनी जान खूफ जोखिम डाल रहे हो कह कर खरी खोटी सुनाई जो की वीडियो मे स्पस्ट सुनाई दें रहा है!ऐसे में ग्रामीणों के सामने बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर तब तक वे अपनी रोजमर्रा की आवाजाही किस तरह करेंगे और रेलवे ट्रैक पार करने के जोखिम से कैसे बचेंगे?

जामगा रेलवे स्टेशन क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि रेलवे प्रशासन को यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। अधूरे फुटओवर ब्रिज के कारण यदि किसी दिन कोई दुर्घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?

ग्रामीणों ने रेलवे प्रशासन से मांग की है कि फुटओवर ब्रिज के निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए और निर्माण में यदि किसी प्रकार की देरी हुई है तो उसके कारणों की जांच कर समयबद्ध तरीके से निर्माण पूरा कराया जाए। साथ ही जब तक फुटओवर ब्रिज का निर्माण पूर्ण नहीं होता, तब तक यात्रियों और ग्रामीणों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक रास्ते की व्यवस्था की जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि उनकी परेशानी सुनना और उसका समाधान करना रेलवे प्रशासन की जिम्मेदारी है। ऐसे में समस्या बताने पहुंचे ग्रामीणों को फटकार के बजाय उनकी सुरक्षा और सुविधा को समझना चाहिए। दो साल का इंतजार ग्रामीणों के लिए सिर्फ समय नहीं, बल्कि रोजाना जान जोखिम में डालकर सफर करने की मजबूरी है।

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